Wednesday, 11 January 2012

वक़्त  के  पैरों  में  चुभी  हर  दर्द  निकाल  देते  हैं ,
ठोकरों  को  भी  मुस्कराहट  भरा  सवाल  देते  हैं ,
लोग  कहते  हैं  दिल  के  बदले  पत्थर   उछालना  ठीक  नहीं ,
हम  तो  चट्टानों  पे  अक्सर  अपना  दिल  उछल  देते  हैं .........
 
 
ज़ख्मों के निशां दिखते हैं पर, कोई ज़ख्म गहरा नहीं दिखता,
ख्वाबों में तेरी डोली दिखती है, अपने सर पर शेहरा नहीं दिखता,
जो देखना चाहे कभी दर्पण कि नजरों से खुद को ये "गुंजन",
सबकुछ आता है नजर बस, आइने में मेरा चेहरा नहीं दिखता....
 
 
कुछ  धूमिल  से  सपने ..........कुछ  बेगाने  कुछ  अपने,
छूते  कल  रात  सिलवटों  में  बेबाक  पल्टे  करवटों  में,
आँख  खुली  जब  होश  आया .....खुदको  यादों  में  लिपटा पाया,
उगते  सूरज  ने  आहट  दी  पहली  किरण  ने मुस्कराहट  दी ,
दिल  ने  टोका  कहाँ  खो  गया ..उठ  जा  भाई  सवेरा  हो  गया,
बाहर  ठंडी  हवाओं  ने  गले  लगाया  तब  दिल  को  सुकून  आया,
चिड़ियों  ने  कहा  सब  फलकारक  हो  फिर  नयी  सुबह  मुबारक  हो ........
 
खुद  अपनी  इबादत  करने  पर  रब  की  इनायत  होती  है,
जब  दिल  के  तार  कोई  छेड़े  उस  रोज  क़यामत  होती  है,
अपनी  तो  हर  राह  हमने  खुद  चुनी  है             जीने  को ,
नसीब  से  जीनेवालों  को  किस्मत  से  शिकायत  होती  है .......
 
 
मेरे  किस्मत  की  हथेली  पर  कोई  लकीर  नहीं  मिलती,
जो  बांधे  बदनसीबी  को  ऐसी  जंजीर  नहीं  मिलती,
बहुत  कोशिश  हूँ  करता  की  मिटा  दूँ  याद  सब  उनके ,
छुपा  रखा  है  जो  दिल  ने  वो एक  तस्वीर  नहीं  मिलती ...
 
 
नई  मंजिल  है  नए  रास्ते  हैं  अब लेकिन ,
कहीं  पर  हैं  मेरे  कुछ  निशान  बाकी  अभी ...
 
ये दिल बड़ा नादान है जो नशे में फर्क न कर सका,
ये उदास है तो ये सोचकर ....की तू मैकदे में क्यूँ आ गई........!!